हिंदी-विश्व भर में : मॉरिशस के विशेष
सन्दर्भ में
वर्तमान समय तकनीकी क्रांति का युग कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं
होगी | तकनीकी क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति होने के कारण ही भौगोलिक दूरियां इतनी सिमट गई हैं कि
समस्त विश्व आज एक लघु ग्राम के रूप में परिवर्तित हो चुका है | विश्व की
अर्थव्यवस्था में अमेरिका और सोवियत संघ के साथ ही दूसरे देशों के भी बढ़ते वर्चस्व और अन्य अनेक
महत्वपूर्ण कारकों की वज़ह से विश्व शक्तियों के समीकरण में भी तात्कालिक एवं
निरंतर उतार चढ़ाव देखने को मिल रहे हैं | आज भारत अपनी अर्थव्यवस्था में तीव्र
प्रगति और विभिन्न क्षेत्रों में निरंतर बढ़ते प्रभाव के कारण सभी महत्वपूर्ण
क्षेत्रों में विश्व गुरु के रूप में अपनी सकारात्मक उपस्थिति दर्ज करा रहा है | प्रधानमंत्री
माननीय श्री नरेंद्र मोदी के इस वक्तव्य ने समस्त विश्व का ध्यान अपनी ओर आकर्षित
किया था कि भारत अकूत प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के साथ साथ विश्व का
एकमात्र ऐसा देश है जिसके पास अन्य देशों की तुलना में ज्यादा युवा और तकनीकी
कौशलों में दक्ष मानव संसाधन है और अपनी इसी खासियत के कारण भारत
शीघ्र ही वैश्विक संरचना के निर्माण में एक
महत्वपूर्ण कारक के रूप में उभरेगा। वाराणसी में पिछले वर्ष हुए प्रवासी दिवस
समारोह में पूर्व विदेश मंत्री स्वर्गीय सुषमा स्वराज ने भी इसी बात को आगे बढाते
हुए अपने संबोधन में कहा था कि अमेरिका,जापान और चीन जैसे देशों में बुजुर्गों
की संख्या में वृद्धि के लिहाज से ये देश बूढ़े होते जा रहे हैं,जबकि भारत में
युवाओं की संख्या बढ़ रही है | इस युवा जनसंख्या के चलते भारत को अभूतपूर्व बढ़त
मिली है जो 2020 तक इसे नूतन युवा भारत बनाने में मदद करेगा |वर्ष 2020 तक भारत
में औसत आयु 29 होगी ,कामकाजी आयु वर्ग
में 64 फीसदी आबादी के साथ यह दुनिया का
सबसे युवा देश है | इस तथ्य से यह
निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारत में सन 1980
के बाद पैदा हुए लगभग 70 करोड बच्चे अगले पांच वर्षों में विभिन्न कौशलों में प्रशिक्षित हो जायेंगे
और विश्व स्थित विभिन्न कंपनियों के बहुत बड़े भाग के बहुत महत्वपूर्ण पदों पर
प्रतिष्ठित होंगे |
विश्व मंच पर भारत की वर्तमान महत्वपूर्ण उपस्थिति, उसका निरंतर बढ़ता वर्चस्व और संभावित परिकल्पनाओं के
आधार पर आसानी से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह सारे संकेत राष्ट्रभाषा और
राजभाषा हिंदीके लिए निश्चित ही अत्यंत शुभकारी सिद्ध होंगे | जैसे –जैसे भारत
विश्व की आर्थिक महाशक्तियों में अपना स्थान मजबूत करता जाएगा,वैसे-वैसे हिंदी भी स्वतः ही महत्वपूर्ण होती जाएगी | इसी
कारण हर हिंदी प्रेमी के मन में कहीं न कहीं ये आशा पल्लवित होती दीख रही है कि हिंदीशीघ्र
ही विश्व भाषा के पद पर प्रतिष्ठित हो ,जिसकी कि वह निर्विवाद अधिकारिणी है । और
यह कहने में कोई संकोच नहीं कि सरल,सहज हिंदीविभिन्न
भाषाओं के शब्दों को आत्मसात करने की अपनी समावेशी प्रकृति के कारण सतत
विकासोन्मुख, और निरंतर प्रवहमान हो रही है और अपनी इसी प्रवृत्ति के कारण समाज के
विभिन्न व्यावसायिक वर्गों में लोकप्रियता के शिखर को छू रही है| हिंदीअपनी बढ़ती मांग के कारण आज जिस प्रकार विश्व बाज़ार पर छा चुकी है, उससे प्रतीत हो रहा है कि वह दिन अब दूर
नहीं, जब वह सबसे ज्यादा व्यवहृत होने वाली भाषा बनकर विश्व भाषा के रूप में स्थापित
हो जायेगी |
नवीनतम सर्वेक्षणों के अनुसार विश्व पटल पर हिंदीकी स्थिति का आकलन करें ,तो
पायेंगे कि बोलने
वालों की संख्या के आधार पर चीनी के बाद विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा के रूप में हिंदीकी गणना की जा रही है ।
डॉ. जयन्ती प्रसाद नौटियाल के भाषा शोध अध्ययन 2005 की मानें तो हिंदी जानने वालों की संख्या के आधार पर हिंदी विश्व
की पहले नंबर की भाषा है क्योंकि हिंदीके प्रयोक्ता विश्व भर में लगभग एक अरब ढाई करोड़
हैं जबकि चीनी बोलने वालों की संख्या पचानवे करोड़ के करीब है। आज हिंदीविश्व के लगभग ढाई सौ देशों में किसी न किसी रूप में प्रयुक्त हो रही है। विश्व
के लगभग दो सौ पचास से अधिक विद्यालयों/विश्व विद्यालयों/संस्थाओं में हिंदीभाषा का अध्ययन –अध्यापन और शोध कार्य
किये जा रहे हैं | हिंदीकी बढ़ती लोकप्रियता को देखकर अनेकों लोकप्रिय अंगरेजी चैनल
अपने हिंदीसंस्करण प्रारंभ कर रहे हैं । विश्व भर से प्रकाशित होनेवाले हिंदीअखबारों
की संख्या में भी निरंतर वृद्धि देखी जा रही है | विश्व के विभिन्न देशों में
नियमित रूप से आज हिंदीपत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं ,जिन्हें विभिन्न संचार माध्यमों
द्वारा विश्व भर के लोगों तक पहुंचाया जा रहा है | सोशल मीडिया पर भी हिंदी सामग्री के प्रयोग में आश्चर्यजनक रूप से
वृद्धि देखी जा सकती है। यह कहना गलत नहीं
होगा कि हिंदीकी इस लोकप्रियता के पीछे
सोशल मीडिया और बॉलीवुड की फिल्मों
तथा गीतों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है |
मॉरिशस में हिंदी
जब हम विदेशों में हिंदी के विस्तार की
बात करते हैं तो मॉरिशस का नाम मस्तिष्क में सबसे पहले आता है | इसके पीछे एक नहीं कई कारण हैं, या ये भी कह सकते हैं कि
पूरा का पूरा एक परिदृश्य है,जिसके अन्दर विस्तृत कालखंड में विभिन्न कारणोंवश अपनी मिटटी से अलग हुए भारतवंशियों के अपने
अस्तित्व की रक्षा के लिए किए गए विलक्षण संघर्ष की वो गाथा समाहित है,जिसमें हिंदीचमत्कारिक
भूमिका निभाते हुए न केवल उनकी संस्कृति और परम्पराओं को सहेजती ,संरक्षित करती
है,बल्कि उनके जीवन का संबल भी बनती है | यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मॉरिशस
के लोगों ने जहां अपने संघर्ष के दिनों में हिंदीको जिया है वहीँ सफलता के दिनों में हिंदीकी भरपूर सेवा करके
उसे समृद्ध और गौरवान्वित भी किया है | यही कारण है कि देखते ही देखते इन भारत वंशी
मजदूरों का गिरमिटिया से सरकार तक का
संघर्षपूर्ण सफ़र विश्व भर में फैले भारतीय डायस्पोरा के लिए अनुकरणीय बन जाता है |
हिंदी के परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह अत्यंत शुभ संकेत है कि है कि भारत
से बाहर मॉरिशस में रचा जा रहा हिंदी
साहित्य परिमाण की दृष्टि से ही नहीं
बल्कि स्तरीयता और उत्कृष्टता की
दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाने में भी पूर्ण
सक्षम है | साहित्यकारों की एक बड़ी श्रृंखला में
मुनीश्वर लाल चिंतामणि,पूजा नन्द नेमा, भानुमति नागदान , अभिमन्यु अनत
,रामदेव धुरंधर, पहलाद रामशरण ,राज हीरामन ,हेमराज सुन्दर आदि ये कुछ नाम हैं जो
विभिन्न विधाओं में लेखन से न केवल हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि कर रहे हैं ,बल्कि
उसे विश्व साहित्य की समकक्षता प्रदान करने में अपनी महती भूमिका का निर्वहन भी
कर रहे हैं | पत्र-पत्रिकाओं की बात करें तो भारत से बाहर मॉरिशस ही एकमात्र ऐसा
देश है,जहां सन 1909 से लेकर आज की तिथि तक 56 पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित हुई
हैं,जिनमें से निश्चित ही कुछ प्रकाशन की असुविधा तथा ऐसे ही कुछ अन्य विशिष्ट
कारणों से बंद हो गई हैं |
मॉरिशस के हिंदी प्रेमियों के लिए यह भी अत्यंत प्रसन्नता और गर्व का विषय
है कि भारत से बाहर मॉरिशस ही एकमात्र ऐसा देश है ,जहां अभी तक तीन विश्व हिंदीसम्मलेन
सफलता पूर्वक आयोजित किये जा चुके हैं | सन 2019 में आयोजित ग्यारहवां विश्व हिंदीसम्मलेन
मॉरिशस की राजधानी पोर्ट लुइस में आयोजित
किया गया था,जहाँ विश्व के तीस देशों के
लगभग तीन हज़ार विद्वानों ने अपनी सक्रिय सहभागिता की थी | मॉरिशस में विश्व हिंदीसचिवालय
की स्थापना विश्व में हिंदीके प्रचार
प्रसार की दिशा में एक और मील का पत्थर है जो मॉरिशस को महत्वपूर्ण बनाता है | सन
...में स्थापित विश्व हिंदीसचिवालय भारत और मॉरिशस की द्विपक्षीय संस्था है,जो
विदेशों में हिंदीके प्रचार-प्रसार और संयुक्त राष्ट्र में हिंदीको आधिकारिक भाषा
का स्थान दिलाने के लिए कृत संकल्प है | सचिवालय द्वारा निकाली जाने वाली विश्व हिंदीपत्रिका
विश्व के हिंदीप्रेमियों को साहित्य सृजन करने,उनके रचे साहित्य को विश्व स्तरीय
पहचान दिलाने और विश्व मंच पर उन्हें निकट
लाकर पारस्परिक संवाद स्थापित करने में
महती भूमिका निभा रही है |
मॉरिशस हिंद महासागर के दक्षिण-पश्चिम में स्थित एक लघु द्वीप है, जिसका
क्षेत्रफल 720 वर्ग मील है,जो 40 मील लंबा और 30 मील चौड़ा है | मॉरिशस अपनी नैसर्गिक
सुषमा के कारण विश्व भर में विख्यात है | द्वीप की खूबसूरती के कारण ही मार्क
ट्वेन ने कहा था कि ईश्वर ने पहले मॉरिशस का निर्माण किया और फिर उसके पश्चात
स्वर्ग की रचना की | भारत और मॉरिशस दोनों
देशों के संबंध न केवल प्राचीन और ऐतिहासिक हैं ,बल्कि बहुआयामी भी हैं | दोनों
देश न केवल समान इतिहास को साझा करते हैं बल्कि वर्तमान में साथ मिलकर उसे सगर्व जीते भी हैं | मॉरिशस की 1.296 मिलियन आबादी में से लगभग 68% लोग भारतीय मूल
के हैं। इसी कारण मॉरिशस
को लघु भारत भी कहा जाता है | दोनों
देशों के बीच संबंधों का पहला अध्याय 2 नवंबर, 1834 को लिखा गया था,जब भारतीय मजदूरों का 32 सदस्यीय समूह गन्ना बगानों में काम करने के लिए एम.वी. एटलस
पर सवार होकर इस द्वीप पर पहुंचा था । आप्रवासी घाट की सोलह सीढ़ियों पर पहला कदम
रखते हुए इन मजदूरों ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यह अनजान द्वीप कुछ समय बाद
इनका अपना देश होगा | यह सच है कि भारत वंशी इन गिरमिटिया मजदूरों ने अपने रक्त और
पसीने से संघर्ष पर विजय की जो अमरगाथा लिखी वह इतिहास के पन्नों पर सुनहरे
अक्षरों में लिखी जायेगी | भारत से आये इन गिरमिटिया मजदूरों ने अपने अदम्य साहस और धैर्य
से मुश्किल हालातों पर विजय प्राप्त कर न
केवल अद्भुत मानवीय क्षमता का परिचय दिया बल्कि इस मोती जैसे चमकदार द्वीप को विश्व मानचित्र पर भी महत्वपूर्ण
पहचान दिलाई | और इनकी इस सफलता के पीछे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई उनकी भाषा,संस्कृति
,परम्परा,रीति –रिवाज़ और संस्कारों ने,जिन्हें वे अपने साथ लेकर आये थे |
मॉरिशस की संस्कृति मिश्रित संस्कृति है जिसका एक बहुत बड़ा भाग भारत के बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश से आये मजदूरों का
था, जिनमें से कुछ तमिलनाडू ,आन्ध्र प्रदेश ओडिशा तथा बंगाल और मद्रास प्रेसिडेंसी
से आए हुए भी थे | ये आपस में जहाजी भाई
कहलाते थे | भारत के बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की भाषा भोजपुरी होने के कारण भोजपुरी
इस द्वीप की संपर्क भाषा के रूप में व्यवहार में आने लगी | और आगे चलकर इसी भाषा
के माध्यम से मॉरिशस वासियों ने हिंदीको जाना ,पहचाना और उसे अपनाया |
मॉरिशस में शर्तबंद मजदूर,गिरमिटिया
(अंग्रेजी भाषा के agreement शब्द का अपभ्रंश रूप ) के रूप में जो लोग भारत आये थे
, वे अपने साथ रामचरित मानस ,हनुमान चालीसा ,कबीर के दोहे और आल्हा खंड आदि लाये
थे | ये मजदूर दिन भर खेतों में काम करते थे और शाम के समय साथ बैठते और अपने दुःख दर्द बांटते थे
,साथ बैठने के कारण इस प्रकार की जगहों को
बैठका कहा जाता था | बैठकाओं का वह पुराना
स्वरूप मॉरिशस में हिंदीपढ़ाने के लिए आज
भी देखा जा सकता है | ये बैठकाएं इन मजदूर भाइयों के लिए शिक्षा प्राप्ति की एक
जगह मात्र नहीं थी ,बल्कि उनके लिए अपने साथ लाये संस्कार,रीति-रिवाज़,परम्पराओं
,उत्सवों और समेकित रूप में संस्कृति के प्रचार-प्रसार का माध्यम भी थीं | मजदूर
लोग अपने बच्चों को सायंकाल में होने वाली इन बैठकाओं में हिंदीभाषा का ज्ञान
दिलाया करते थे | “राम गति देहु सुमति” यह इन बैठकाओं का आदर्श वाक्य था ,जिसके
माध्यम से वे भगवान् से प्रार्थना करते थे कि वे उन्हें जीवन भर सद्मार्ग पर चलने की
शक्ति प्रदान करें| इन बैठकाओं में पढ़ाई जाने वाली हिंदीका स्वरूप कमोवेश उस समय
भारत में प्रचलित खडी बोली के रूप से बहुत कुछ मिलता जुलता था | वर्णमाला ,ककहरा
,बारह खडी ,वर्तनी ,स्वर तथा व्यंजन आदि प्रारंभिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में समाहित
रहते थे | समय परिवर्तन के साथ द्वीप पर
उस समय की ब्रिटिश सरकार का ध्यान शिक्षा के स्तर को सुधारने की ओर गया और सन 1855
में राज्यपाल हिगिन्सन द्वारा नियुक्त आयोग ने 06 से लेकर 12 वर्ष तक के सभी
बच्चों के लिए शिक्षा को अनिवार्य बना दिया,जिनमें शिक्षण का माध्यम फ्रेंच भाषा रखी
गई ,लेकिन आप्रवासियों के असंतोष के पश्चात प्राथमिक पाठशालाएं खुलना प्रारंभ हुआ
जिनमें शिक्षण का माध्यम भोजपुरी,खड़ी बोली और तमिल रखा गया | सन 1892 से रॉयल कॉलेज,पोर्ट लुइस में सबसे पहले हिंदीकी पढाई प्रारंभ की गई | सरकारी स्कूलों की समय सारणी में हिंदीको मार्च 1954
में स्थान मिला |स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात
मॉरिशस सरकार द्वारा हिंदीअध्ययन –अध्यापन
पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा |हिंदीसरकारी और गैर सरकारी स्कूलों में पढ़ाई जाने लगी | भारत से विभिन्न हिंदीविद्वानों
को हिंदीभाषा के विकास तथा हिंदीके प्रशिक्षण के लिए मॉरिशस आमंत्रित किया जाने
लगा|
हिंदी के प्रचार –प्रसार में हिंदी सेवी
संस्थाओं का योगदान :
मॉरिशस में औपचारिक हिंदी शिक्षण की बात करें तो सबसे पहला नाम महात्मा
गाँधी संस्थान का लिया जाएगा ,जहाँ 1980 से मॉरिशस विश्वविद्यालय के अंतर्गत हिंदी
में ग्रेजुएट तथा पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री के साथ साथ हिंदीभाषा तथा साहित्य की
विभिन्न विधाओं में शोध कार्य भी किए जाते हैं | संस्थान के हिंदी विभाग में स्तरीय प्राध्यापकों के साथ –साथ
भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् द्वारा
नियुक्त हिंदी पीठ अपने अनुभव और विद्वत्ता से विद्यार्थियों को
लाभान्वित करते हैं | संस्थान का अपना प्रकाशन विभाग भी है जहां से मॉरिशस के
हिंदी साहित्यकारों के साहित्य को समय-समय पर प्रकाशित किया जाता है | संस्थान की
अपनी मासिक पत्रिकाएँ रिमझिम और वसंत भी साहित्य जगत में अपनी विशिष्ट पहचान रखती
हैं |
मॉरिशस में हिंदी का प्रचार प्रसार करने में आर्य सभा का बहुत बड़ा योगदान
रहा | आर्य सभा की स्थापना मॉरिशस में सन 1903 में हुई थी| यह निर्विवाद है कि सत्यार्थ
प्रकाश के माध्यम से ही खड़ी बोली हिंदीकी
नींव मॉरिशस में पडी | आर्य सभा के अनुयायियों .जैसे काशी नाथ क्रिश्तो ,मणिलाल
डॉक्टर ,मोहन लाल मोहित तथा उदय नारायण गंगू आदि ने मॉरिशस में हिंदीकी भाषाई और
सांस्कृतिक चेतना को जागरूक रखने में महती भूमिका निभाई | आर्य सभा द्वारा सन 1911
में आर्य पत्रिका तथा आर्यवीर का प्रकाशन प्रारंभ किया गया ,इन दोनों पत्रिकाओं का
प्रकाशन आगे चलकर 1950 में साप्ताहिक
आर्योदय के रूप में होने लगा,जो आज तक जारी
है | आर्य सभा द्वारा वर्तमान में तीन सौ सायंकालीन और सप्ताहांत पाठशालाएं चलती हैं ,साथ
ही दो डी.ए.वी कॉलेज भी चलते हैं जहां एक
विषय के रूप में हिंदीका अध्ययन अनिवार्य है |
सन 1935 में स्थापित हिंदी प्रचारिणी सभा जो पूर्व में तिलक विद्यालाय
के नाम से जानी जाती थी, की स्थापना का मुख्य उद्देश्य प्राथमिक से लेकर माध्यमिक
स्तर तक के बच्चों को शुद्ध व्याकरण सम्मत हिंदी का ज्ञान प्रदान करना तथा साहित्य –लेखन
के प्रति उनकी रूचि जागृत करना था | सभा का आदर्श वाक्य है : “भाषा गई तो
संस्कृति भी गई” | वर्तमान में सभा द्वारा लगभग ढाई सौ सायंकालीन तथा प्राथमिक एवं माध्यमिक
कक्षाएं आयोजित की जाती हैं और हिंदी साहित्य सम्मलेन,प्रयाग की परिचय,प्रथमा
तथा उत्तमा परीक्षाएं भी आयोजित की जाती हैं | सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाले
छात्रों को प्रतिवर्ष सभा द्वारा छात्रवृत्ति भी दी जाती है | छात्र छात्राओं को शुद्ध हिंदीलिखने और बोलने के
लिए सभा वर्ष भर विभिन्न साहित्यिक प्रतियोगिताएं भी आयोजित करवाती है | हिंदी प्रचारिणी सभा द्वारा सन 1935 में श्री सूर्य प्रकाश मंगर “भगत” के
सम्पादन में हस्तलिखित पत्रिका “दुर्गा” निकाली गई जिसका प्रकाशन तीन वर्ष- सन
1935 से 1937 तक चला ,जिसके कुल चौंतीस अंकों में 1986 रचनाएँ संकलित की गईं |
मॉरिशस की हिंदी पत्रकारिता की दृष्टि से दुर्गा का स्थान उल्लेखनीय कहा जा सकता
है | ब्रिटिश सरकार के भय से लेखक अपने विचारों की अभिव्यक्ति अपने छद्म नामों
,यथा ,ज्वालामुखी ,खनखन ,चिंगारी आदि से करते थे | अभी हाल में ही ग्यारहवें विश्व
हिंदीसम्मलेन के उपलक्ष्य में विदेश मंत्रालय,भारत सरकार द्वारा इस पत्रिका का
प्रकाशन करवाया गया है ताकि इस दुर्लभ पत्रिका को उसके मूल स्वरुप में संरक्षित
करके इसमें उपलब्ध साहित्यिक सामग्री को विश्व भर के हिंदीप्रेमियों/शोधार्थियों
तक पहुंचाया जा सके | वर्तमान में सभा द्वारा “पंकज” पत्रिका का त्रैमासिक प्रकाशन
भी किया जा रहा है |
मॉरिशस के हिंदी सेवियों और हिंदी प्रेमियों में साहित्य लेखन के प्रति रुचि
उत्पन्न करने और उसमें दक्षता हासिल करने के उद्देश्य से मुनीश्वर लाल चिंतामणि
द्वारा सन 1961 में “हिंदीलेखक संघ” की
स्थापना की गई | लेखक संघ द्वारा समय-समय पर विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रम तथा
लेखकों द्वारा विभिन्न विधाओं पर लिखी विभिन्न पुस्तकों का प्रकाशन किया जाता है |
लेखक संघ द्वारा सन 1965से बाल सखा और 2017 से हिंदीलेखक संघ पत्रिका का प्रकाशन
किया जा रहा है |
प्रसिद्ध अधिवक्ता, फ्रेंच, हिंदीऔर अंग्रेजी में समानाधिकार से लिखने
वाले लेकिन हिंदीके अद्भुत प्रेमी सोमदत्त बखोरी द्वारा सन 1963 में हिंदीपरिषद् की स्थापना की गई | परिषद् द्वारा साहित्य के प्रचार प्रसार के
लिए अठारह प्रांतीय परिषदें स्थापित की गईं ,जहां हिंदीके विकास ,साहित्य-सृजन के
लिए महत्वपूर्ण गोष्ठियां आयोजित की जाती थीं | परिषद् द्वारा अनुराग त्रैमासिक पत्रिका का
प्रकाशन भी होता था |
इसके अतिरिक्त मॉरिशस में इन्द्रधनुष हिंदीपरिषद्, सनातन धर्म मंदिर
परिषद्, हिंदीसंगठन ,हिंदीसाहित्य अकादेमी , गहलोत सभा अदि सामाजिक –सांस्कृतिक
संस्थाओं द्वारा विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रमों ,साहित्यिक प्रकाशनों ,साहित्यिक
संगोष्ठियों ,हिंदीकक्षाओं के सञ्चालन द्वारा वर्ष भर हिंदीभाषा के प्रचार प्रसार
का कार्य किया जाता है |
वैश्विक परिदृश्य के संदर्भ में
कहा जा सकता है कि हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में विभिन्न कारणों से
विश्व के विभिन्न देशों में गए और वहीँ बस गए भारतवंशियों का योगदान अप्रतिम है | और
यही कारण है कि आज जहाँ हिंदी विश्व के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश की
राजभाषा-राष्ट्रभाषा है ,वहीँ विश्व के कई देशों में लिंगुआ फ़्रैंका के रूप में परस्पर
विचारों के आदान प्रदान का सशक्त माध्यम बनकर भी आगे बढ़ रही है | हिंदी के
प्रयोगगत वैविध्य और समयानुकूल वैस्तार्य को
देखकर यह तो निसंदिग्ध है कि हिंदी अपने निर्धारित मंतव्य की ओर तीव्र गति से
उन्मुख है, अब आवश्यकता हिंदी प्रेमियों के उस समेकित पुरजोर प्रयास की है ,जिसके लिए सब एक साथ इस बात का संकल्प लें कि अपने दैनिक
व्यवहार में हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग
करेंगे और अपनी नई पीढी को भी ऐसा करने के
लिए प्रोत्साहित करेंगे | और इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण है कि हम न केवल हिंदी पर गर्व महसूस करें बल्कि कभी भी ,कहीं
भी ,किसी के साथ भी उसका प्रयोग करते हुए स्वयं को भी गौरवान्वित समझें |
डॉ.नूतन पाण्डेय
केंद्रीय हिंदी निदेशालय
मानव संसाधन विकास मंत्रालय ,भारत
सरकार
मोबाइल : 7303112607
Comments
Post a Comment