नचिकेता

नचिकेता!
मुझे करना है आज तुमसे सीधा संवाद ,
हाँ ,सीधा संवाद ।
क्योंकि बेचैन हूँ मैं , उद्वेलित भी
उतनी ही शायद
जितने बेचैन और उद्वेलित थे तुम कभी
शांत करने को अपनी जिज्ञासा ,मृत्यु के देव से ।
कठोपनिषद कहता है ,भूखे प्यासे पड़े रहे थे तुम तीन दिन यम के द्वार पर
जिसके बदले में मिले थे तुम्हें तीन वरदान ।
और प्रत्युत्तर में जानना चाहा था तुमने मृत्यु का शाश्वत रहस्य ।
आत्मा – परमात्मा के मिलन का रहस्य ,
वो रहस्य ,जिसे नहीं जान सकते योगी,परम योगी  भी ।
प्रत्यक्ष या अनुमान से निर्णय नहीं कर सकते उस आत्मतत्व का ।
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो ,न मेधया न बहुधा श्रुतेन
और नेति –नेति कहकर खोजते रहते हैं  ताउम्र ।
तुम्हारी भी तो इच्छा थी खोजना अग्नि विद्या का वो रहस्य ,
जिसे जानकर प्राप्त किया जा सकता है स्वर्ग ।
इच्छुक थे तुम भी तो यह जानने को कि मर्त्य शरीर कहाँ जाता है मृत्यु के बाद ?
लेकिन समझ नहीं आया मुझे ,
क्या कारण रहा होगा तुम्हारी इस जिज्ञासा का !
क्या इतने व्यथित हो गए थे तुम अपने पिता वाजश्रवा के मिथ्याभिमान से
जो पाना चाहता था परमपद ,
क्षीण , दुर्बल ,अदुग्धा गायों के बदले ,
या फिर छलनी हो गया था तुम्हारा ह्रदय
जब उन्होंने क्रोध में भरकर दान कर दिया था तुम्हें यमराज को ।
तभी शायद मोहभंग हो गया था तुम्हारा
क्षणभंगुर इस जीवन और जीवन संबंधों से
लेकिन क्या तुमने यह नहीं सोचा ?
कि किसी को नहीं है जरूरत यह जानने की
कि मृत्यु के बाद क्या होता है ?
बल्कि जानना चाहते हैं सब क्या है ये  जीवन !
कहाँ से आते हैं हम सब ?
कोई क्यों भोगता है स्वर्ग के सुख?
और किसी को  क्यों नहीं मिलती  दो जून की रोटी ? क्यों अंश अंश में हर रोज मरते हैं सब?
तुम तो उत्सुक थे जानने को मृत्यु के बाद  का सच
और करना चाहते थे ग्यारह दरवाजों वाले नगर से ब्रह्म का ज्ञान और दर्शन ।
पर पता नहीं क्यों नहीं जानना चाहा तुमने
इस जीवन का वह कटु सत्य
जो भोगता है मनुष्य यहीं जीते जी ,जीकर हर पल ,हर क्षण ।
आश्चर्य है ,न तो जीवन का सौन्दर्य खींच पाया तुम्हें अपनी ओर
जिसमें बहता है सृष्टि  का उद्दाम वेग,
जिससे बंधकर होती है अद्भुत सर्जनाएं
और  न ही  जीवन की विसंगतियाँ पर ध्यान गया तुम्हारा  कभी 
जिसमें भटकता रहता है प्राणी और खोजता रह्ता है उनसे निकलने का मार्ग ताउम्र ।
गीता में लिखा है आत्मा मरती नहीं ,मरता है शरीर
पर क्या तुम्हें नहीं लगा कि आत्माएं ही मरती हैं
और जिन्दा तो रहते हैं केवल शरीर निष्प्राण पुतलों की तरह घूमते यहाँ से वहां ।
मुझे तो ,हाँ सच ,मुझे तो लगता है
कि तुमने शायद भोगा ही नहीं होगा ये सब
जिसे भोगते आये हैं हम सब हर घड़ी ,हर पल
तभी तो तुमने नहीं जानना चाहा ,इस जीवन का वह  कटु ,शाश्वत और अनिवार्य  रहस्य
और उसकी पर्त दर पर्त , जिसे खोलना ,जिसे जानना
मृत्यु के रहस्य को जानने से भी दुष्कर है
और शायद असंभव भी !!!!!
@ नूतन पाण्डेय
 

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